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टाम अल्टर : अभिनय का एक अमिट क्षितिज

                                                                                   .JAI NARYAN PRASAD , JANSATTA KOLKATA ,9830880810
तीस सितंबर, 2017 की सुबह वाकई बहुत गमगीन रही। आंख खुलते ही भतीजे ने बताया कि अभिनेता टाम अल्टर अब इस दुनिया में नहीं रहे। लंबे अरसे से जानता था कि उन्हें स्किन कैंसर हैं और चौथे स्टेज में होने के कारण वे कभी भी हमें अलविदा कह सकते हैं। खबर सुनकर एकबारगी जैसे झटका-सा लगा, क्योंकि इस ब्लू आंख वाले साहेब-अभिनेता को मैं लंबे अरसे से जानता-पहचानता था। अभिनेता के तौर पर नहीं, एक नेक इंसान और साफ बोलने वाले वक्ता के तौर पर। कोलकाता के नंदन प्रेक्षागृह में कम-से-कम तीन दफे मुलाकात हुई होगी। एक दफा संगीत कलामंदिर प्रेक्षागृह में उनका अबुल कलाम आजाद वाला नाटक देखने गया था। हर बार बहुत ही शालीनता से वे मिले थे। लगता था जैसे बहुत पुरानी जान-पहचान है ! चाहता तो इंटरव्यू भी कर सकता था, लेकिन कभी हिम्मत ही नहीं हुई। उनसे जब भी मुलाकात हुई, हर बार पता नहीं क्यों लगा कि टाम साहेब इंटरव्यू से कहीं बहुत ऊंचे हैं। उनकेे पास ज्ञान का अकूत भंडार था और थीं अभिनय की संवेदनशील सूक्ष्म बारीकियां ! किसी भी भाषा के प्रति समझ तो उनमें ग़ज़ब की थी। टाम अल्टर को करीब से देखते ही सत्यजित राय, रिचर्ड एटनबरो और श्याम बेनेगल याद आने लगते। वर्ष 1982 में बनी रिचर्ड एटनबरो की ‘गांधी’ मुझे बरबस याद आने लगती। जुनून सीरियल से लेकर फिल्म परिंदा, सलीम लंगड़े पे मत रो, राम तेरी गंगा मैली, शतरंज के खिलाड़ी और न जाने कितनी फिल्में याद आ रही हैं। करीब तीन सौ फिल्में उन्होंने की है। उनकी पहली हिंदी फिल्म ‘चरस’ तो लिस्ट में थी ही। आश्चर्य लगता था अंग्रेजी एक्सेंट का यह आदमी कैसे अपनी हिंदी फिल्मों में आ गया ? अनेक दफे मुलाकात के बाद समझ में आया कि टाम अल्टर पूरी तरह जुनूनी था। एक दक्ष अभिनेता के अलावा टाम को हिंदी-उर्दू की गज़ब की भाषाई समझ थी। उर्दू की समझ दिलीप कुमार साहेब से इंटरव्यू के बाद उन्हें आई थी। उन्हें शायरी खूब आती थी। वे कहते भी थे कि बिना शेरो-शायरी की समझ के एक अच्छा अभिनेता बनना नामुमकिन है। बेहतरीन इंसान तो और भी नहीं! उनके हिंदी-उर्दू उच्चारण में मुझे कहीं दोष नहीं दिखता था। आश्चर्य में पड़ जाता था ! क्रिकेट की टाम साहेब को बखूबी जानकारी थी। सचिन तेंदुलकर के पहले वीडियो इंटरव्यू का श्रेय उन्हें ही है। उनका बड़ा बेटा टाइम्स आफ इंडिया में अभी भी खेल पत्रकार हैं। बहन हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से एशियन स्टडीज में पीएचडी है और भाई एक दक्ष शिक्षक के अलावा जाने-माने अंग्रेजी के कवि हैं। पुणे के फिल्म एंड टेलीविजन संस्थान में उनके बैच के अभिनेता नसीरुद्दीन शाह, शबाना आजमी और बेंजामिन गिलानी रहे हैं। थोड़े दिनों तक अमेरिका में पढ़ने के बाद वापस मुसौरी आ गए थे। फिर राजेश खन्ना की ‘आराधना’ फिल्म ने उन्हें ऐसा दीवाना-मतवाला बनाया कि टाम साहेब ने पुणे के फिल्म एंड टेलीविजन संस्थान में दाखिला ही ले लिया और वहां से निकले तो फिल्म ‘चरस’ मिल गई। 1972 से 1974 तक वे फिल्म संस्थान में रहे और 1976 से 2017 तक लगातार अभिनय करते रहे। शायद उनकी आखिरी फिल्म ‘सरगोशियां’ है। कविता, शेरो-शायरी और रंगमंच जैसे उनके रग-रग में समाया हुआ था। अब हमें कत्तई नहीं लगता कि ऐसा दक्ष व प्रतिभाशाली अभिनेता दोबारा नसीब होगा ! आपको लगता हो, तो बताने से चुकिएगा मत !